Friday, November 2, 2007

दीपशिखा

एक दीप जलाएं नव आगंतुकों के नाम।
जिनकी किलकारियों से जीवन मिल।
इस खंडहर घर को।।

एक दीप जलाएं भाई-बहन के रिश्तों की।
जिसमें बहन के प्रेम और समर्पण के साथ
शामिल हो भाई का स्नेह भी।।
जो आलोकित हो सहोदर सा प्रकाशवान बनकर।
ताकि मिट जाए मन के अमावस का अंधकार।।

एक दीप जलाएं बंधुत्व की रौशनी से सराबोर,
जो सजा हो सखी के अपनत्व से।
भावों के जाने-अनजाने अर्थ से।।
जीवन के हर मोड़ पर जो
साथी बनकर राह दिखाए।
चिर-प्रसन्न लौ की भांति,
दुःख के झंझावत में भी मुस्काए।।

एक दीप जलाकर तरुणाई की बेला में,
दाम्पत्य का उजास भरें।
जो साक्षी बने जीवन के हर क्षण का।
जय-पराजय का स्वार्थ भावन से परे,
निःस्वार्थ मन का।।
जहां शब्द मौन हो जाते हैं रिश्तों की परछाई में।
न्यौछावर कर प्रेम-सुधा भावों की अंगनाई मे।।

जलाएं एक दीपशिखा
घर के बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद से आलोकित।
क्योंकि यही तो हैं वो प्रकाश-पुंज
जिनकी स्नेहमयी छत्रछाया में फलते हैं रिश्तों के फूल।।
जो अपनी चिर मुस्कान को
सर्वदा सहेजकर रखते हैं।
ताकि उसकी आभा से
परिवार के हर सदस्य का जीवन खुशियों से दमकता रहे।।

और अंत में एक दीपक रौशन करें
महाप्रयाण की मंगलयात्रा पर।
क्योंकि खुद को होम करना ही तो
जीवन-तप कहलाता है।।
हर आहुति के साथ ये जीवन
प्रभू की पावन ज्योति में विलीन हो जाता है।
और तब अंतर का तम सारा उजियारे से भर जाता है।।

2 comments:

आशीष said...

बहुत प्‍यारी कविता है। बस ऐसे ही लिखती रहो
आशीष महर्षि

राजीव जैन said...

जयपुर ब्‍‍लॉगर्स परिवार
की ओर से आपको हार्दिक बधाई
बस यूं ही लिखती रहें